Friday, 23 October 2020

चुनावी काव्य

पांच साल के बाद आता

यह उनका  त्योहार

मुख में घास रख,  त्यागी बनने का

कुछ ऐसा दिखाते

जनता के प्रति प्यार


कल तक मुछ पर ताव दिखाने वाले

खुद को बब्बर शेर बतलाने वाले

अब सिर झुका कर मांगेगे वोट

द्वार द्वार दौड़ेंगे

जैसे बैल कर रहा हो खेत जो


गरीब जनता उनके स्वागत में

पलके बिछा देंगे

रास्तों को फूलो से सजा देंगे

महिलाएं उनकी आरती करेंगी

युवा उनके सारथी बनें

आगे पीछे गाड़ियों का सैलाब होगा

झूठे वादों का विकास हो


अब वो

झोड़पट्टियां में रहने वालो को

इंद्रा आवास देंगे

शिक्षा स्वास्थ्य का विकास करेंगे

कोई युवाओं को रोजगार देने की बात करेंगे


तो कोई बुजुर्ग को करेगा वादा

देने का पेंशन

कोई भूखा न रहेगा 

सबका बना देंने का कार्ड राशन


वोट के लिए अपना सर्वस्व दान करेंगे

एक दूसरे को नीचा दिखाने की बात करेंगे


कुछ जाति धर्म की बात करें

तो कुछ एक दूसरे के मजहब पर घात करें

लालच दे खरीदेंगे वोट

चापलूस करने वाले

खाएंगे बादाम अखरोट


गिरगिट की तरह हर पल रंग बदलें

कुर्सी के लिए

रिश्ते-नाते संग बदलेंगे


जीत के लिए नारे पे नारे होंगे

बाते कुछ ऐसे प्यारे प्यारे होंगे


जैसे वो हो जनता का मसीहा

गरीबों के जिंदगी में

जैसे बन कर जलेंगे दिया


ऐसे में आप सावधान रहे जाति धर्म की बात करने वालो के बातो से खुद को दूर रख दूसरो को भी हकीकत से रूबरू होने को कहे तभी जाकर विकास का काम हो एक सुंदर भारत का निर्माण होगा ।

                                                              ✍️कुमार मुकेश




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आप इसका वीडियो भी नीचे दिए गए लिंक पर सुन सकते है

 https://youtu.be/eBv2Q08lbvk

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Sunday, 19 July 2020

साईकिल गर्ल ज्योति

सुना था बेटी सर की भार होती हैं
पराई घर की हार होती है
गरीब मा बाप के आंसू की धार होती
क्या पढ़ा लिखा कर फायदा
ये तो केवले दहेज रूपी सार होती है

पर मेरा यह भर्म को टूट गया
इतिहास के पन्नों में एक और अध्याय जुट गया
आवश्यकता है अब हमे भी 
उनके प्रति नज़रिया बदलने की
बेटी भी बेटा जैसा ही होती है
उनके लिए मन में समभाव रखने की

यह बेटी ही है जो हजारों किलोमीटर चल कर 
अपने बाप का सहारा बनी
इस भुखमरी के वक्त में 
अपनो के लिए डूबते नदी में किनारा बनी
जिसे सारा दुनिया कहता है अबला नारी
वह अबला नारी सभी के लिए
साहस की पिटारा बनी

जिसके साहस को देशं ने ही नहीं
बल्कि दुनिया ने माना
इस मिटी के कोख में है 
न जाने कैसी कैसी कैसीे वीरांगनाएं है
को सही माना

मै भी उसके जज़्बे हौसले को सलाम करता हूं
अपनी एक छोटी सी रचना 
भारत की बेटी  ज्योति के नाम करता हूंl

Saturday, 18 July 2020

तब वक़्त यही कहता है

 जब घास की रोटी खानी पड़े
         पेट पीठ हो जाएं
         रोटी के लिए काम मांगे तो
         जानवरों की तरह पिटाए
         मा का दूध न मिलने पर
         बच्चा तड़प जब मर जाए
         तब वक्त यही कहता है 
         हर दर्द गरीब रहता है 
 
 जब भूमि बंजर होने लगे
          नन्ही कलियां मुरझाएं
          बागों में खुश्बू न रहे
          सावन पतझड़ बन जाए
           अन का हर कण रोए 
           भूमि बंजर हो जाए 
          तब वक्त यही कहता है 
          हर दर्द किसान सहता  है 
 
 जब सूरज टिमतीमने लगे
           आंधी नज़र न आए
           मेघों का गड़गड़ाहट  सुनाई दे
           चातक तड़प मर जाए
      जब निर बिन जलचर  तड़पे
       सागर की लहरें खुद में सिमट जाए
           तब वक्त यही कहता है 
           यह दर्द  प्रकृति सहता है 
 
 जब पृथ्वी  भार से सहमे
           सुनामी तांडव दिखाए
            धरती फट मानव निगलेे
            जंगल  राख हो जाए
            महामारी का भयावह रूप देख
           इंसान हि इंसान से दूरियां बनाए
            तब वक्त यही कहता है 
            कृतिकार अति नहीं सहता है 
 
 जब मनु प्राकृतिक नियम भूले
          जीव ही जीव खाए
          मूर्ख उपदेस्क बनने लगे
          स्वार्थ मुख फैलाए
          मंगल चांद जीवन बसाने चले
        पर खुद के आशियाना को बारूदो से सजाए
          तब वक्त यही कहता है 
          खुद की करनी मानव सहता है 
 
 जब चारो तरफ कुछ नजर आए
       तो परिवार को गले लगाएं
         मा बाप को आदर दे 
         बच्चो पर प्यार लुटाए
         भूले हुए दूरदर्शन को अपना कर
         रामायण महाभरत लुफ्त उठाएं 
         तब वक्त यही कहता है 
         अतीत भी अपना महत्व रखता है

Monday, 28 October 2019

दीपावली पर कविता 'आया दीपों का त्योहार'

-:आया दीपों का त्योहार:-

हर साल की भांति आया 
दीपों का त्योहार,
जाति-धर्म को भूलकर 
बाटेंगे एक-दूजे को प्यार।

कई दिन पहले से
सब करते हैं तैयारी,
क्या क्या खरीदारी करें
सोचे सब नर नारी,
कोई खरीदे वस्त्र-आभूषण
कोई खरीदे फूलों का हार,
बच्चों के मन को भाए
पटाखों-फुलझड़ी का कतार,
सुख-दुःख को भूल जाएंगे
भूल जाएंगे आपसी तकरार, 
हर साल की भांति आया
दीपों का त्योहार ।

यहा ऐसा त्यौहार है जिसे
पूरा देश मनाता,
घर-आंगन को स्वच्छ कर
फूलों-रंगोली से सजाता,
कोई जलाए मिट्टी के दिए
कोई जलाए मोमबत्ती,
कोई  जलाए टिमटिमाते बल्ब
जलाए खुशबूदार अगरबत्ती,
सबके जीवन में होगा
खुशियों का भंडार, 
हर साल की भांति आया
दीपों का त्योहार।

पर कुछ लोगों के नादानी के कारण
यह फीका पड़ जाता,
जुआ-आतिशबाज़ी के चक्कर में
सारा रूपया-पैसा गवाता,
घर में आई लक्ष्मी का
हम सब कर ले आदर, 
उतना ही खर्च करें
जितना बड़ा हो चादर,
वरना एक दिन की खुशी के लिए
हो जाओगे कंगाल, 
महंगाई के इस दौर में
नोचने लगोगे तन का बाल।

बच्चों की कविता 'जब मैं था नन्हा बच्चा'

प्याज की बढ़ती महंगाई

प्याज की महंगाई आंसू रुलाए


मुझे बना दो सब्जी का राजा
खबर है बिलकुल ताजा ताजा
आम जनता के लिए है सज़ा
तो व्यापारियों पी रहे हैं माजा
क्योंकी सबसे अधिक है मेरा दाम
सपने में भी कीमत के कारण
कोई खरीदने का नहीं लेता नाम
हर मौसम हर सब्जी में मेरा
मसाले के रूप में है काम
इसी कारण  कर देते हैं बदनाम
मुझे व्यापारी पहले करते स्टोक
दाम बढ़ा कर जमाते है पर रौब
शासक भी होती है इसमें सहभागी
जिन्हें चुनाव लड़ने के लिऐ
चंदा मिलती है मुंहमांगी
इसलिए मिस इंडिया तो नहीं
पर 2019 का ताज पहना दो
मुझे सब्जी का राजा बना दो
  1.                          📖✍️ पं मुकेश कुमार


चुनावी काव्य

पांच साल के बाद आता यह उनका  त्योहार मुख में घास रख,  त्यागी बनने का कुछ ऐसा दिखाते जनता के प्रति प्यार कल तक मुछ पर ताव दिखाने वाले खुद को ...