जब घास की रोटी खानी पड़े
पेट पीठ हो जाएं
रोटी के लिए काम मांगे तो
जानवरों की तरह पिटाए
मा का दूध न मिलने पर
बच्चा तड़प जब मर जाए
तब वक्त यही कहता है
हर दर्द गरीब रहता है
जब भूमि बंजर होने लगे
नन्ही कलियां मुरझाएं
बागों में खुश्बू न रहे
सावन पतझड़ बन जाए
अन का हर कण रोए
भूमि बंजर हो जाए
तब वक्त यही कहता है
हर दर्द किसान सहता है
जब सूरज टिमतीमने लगे
आंधी नज़र न आए
मेघों का गड़गड़ाहट सुनाई दे
चातक तड़प मर जाए
जब निर बिन जलचर तड़पे
सागर की लहरें खुद में सिमट जाए
तब वक्त यही कहता है
यह दर्द प्रकृति सहता है
जब पृथ्वी भार से सहमे
सुनामी तांडव दिखाए
धरती फट मानव निगलेे
जंगल राख हो जाए
महामारी का भयावह रूप देख
इंसान हि इंसान से दूरियां बनाए
तब वक्त यही कहता है
कृतिकार अति नहीं सहता है
जब मनु प्राकृतिक नियम भूले
जीव ही जीव खाए
मूर्ख उपदेस्क बनने लगे
स्वार्थ मुख फैलाए
मंगल चांद जीवन बसाने चले
पर खुद के आशियाना को बारूदो से सजाए
तब वक्त यही कहता है
खुद की करनी मानव सहता है
जब चारो तरफ कुछ नजर आए
तो परिवार को गले लगाएं
मा बाप को आदर दे
बच्चो पर प्यार लुटाए
भूले हुए दूरदर्शन को अपना कर
रामायण महाभरत लुफ्त उठाएं
तब वक्त यही कहता है
अतीत भी अपना महत्व रखता है
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