Sunday, 19 July 2020

साईकिल गर्ल ज्योति

सुना था बेटी सर की भार होती हैं
पराई घर की हार होती है
गरीब मा बाप के आंसू की धार होती
क्या पढ़ा लिखा कर फायदा
ये तो केवले दहेज रूपी सार होती है

पर मेरा यह भर्म को टूट गया
इतिहास के पन्नों में एक और अध्याय जुट गया
आवश्यकता है अब हमे भी 
उनके प्रति नज़रिया बदलने की
बेटी भी बेटा जैसा ही होती है
उनके लिए मन में समभाव रखने की

यह बेटी ही है जो हजारों किलोमीटर चल कर 
अपने बाप का सहारा बनी
इस भुखमरी के वक्त में 
अपनो के लिए डूबते नदी में किनारा बनी
जिसे सारा दुनिया कहता है अबला नारी
वह अबला नारी सभी के लिए
साहस की पिटारा बनी

जिसके साहस को देशं ने ही नहीं
बल्कि दुनिया ने माना
इस मिटी के कोख में है 
न जाने कैसी कैसी कैसीे वीरांगनाएं है
को सही माना

मै भी उसके जज़्बे हौसले को सलाम करता हूं
अपनी एक छोटी सी रचना 
भारत की बेटी  ज्योति के नाम करता हूंl

Saturday, 18 July 2020

तब वक़्त यही कहता है

 जब घास की रोटी खानी पड़े
         पेट पीठ हो जाएं
         रोटी के लिए काम मांगे तो
         जानवरों की तरह पिटाए
         मा का दूध न मिलने पर
         बच्चा तड़प जब मर जाए
         तब वक्त यही कहता है 
         हर दर्द गरीब रहता है 
 
 जब भूमि बंजर होने लगे
          नन्ही कलियां मुरझाएं
          बागों में खुश्बू न रहे
          सावन पतझड़ बन जाए
           अन का हर कण रोए 
           भूमि बंजर हो जाए 
          तब वक्त यही कहता है 
          हर दर्द किसान सहता  है 
 
 जब सूरज टिमतीमने लगे
           आंधी नज़र न आए
           मेघों का गड़गड़ाहट  सुनाई दे
           चातक तड़प मर जाए
      जब निर बिन जलचर  तड़पे
       सागर की लहरें खुद में सिमट जाए
           तब वक्त यही कहता है 
           यह दर्द  प्रकृति सहता है 
 
 जब पृथ्वी  भार से सहमे
           सुनामी तांडव दिखाए
            धरती फट मानव निगलेे
            जंगल  राख हो जाए
            महामारी का भयावह रूप देख
           इंसान हि इंसान से दूरियां बनाए
            तब वक्त यही कहता है 
            कृतिकार अति नहीं सहता है 
 
 जब मनु प्राकृतिक नियम भूले
          जीव ही जीव खाए
          मूर्ख उपदेस्क बनने लगे
          स्वार्थ मुख फैलाए
          मंगल चांद जीवन बसाने चले
        पर खुद के आशियाना को बारूदो से सजाए
          तब वक्त यही कहता है 
          खुद की करनी मानव सहता है 
 
 जब चारो तरफ कुछ नजर आए
       तो परिवार को गले लगाएं
         मा बाप को आदर दे 
         बच्चो पर प्यार लुटाए
         भूले हुए दूरदर्शन को अपना कर
         रामायण महाभरत लुफ्त उठाएं 
         तब वक्त यही कहता है 
         अतीत भी अपना महत्व रखता है

चुनावी काव्य

पांच साल के बाद आता यह उनका  त्योहार मुख में घास रख,  त्यागी बनने का कुछ ऐसा दिखाते जनता के प्रति प्यार कल तक मुछ पर ताव दिखाने वाले खुद को ...